वाकिअए इफ़क इसी गज़वे से ज़ब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मदीना वापस आने लगे तो एक मंजिल पर रात में पड़ाव किया। हजरते आइशा रदियल्लाहु अन्हा एक बन्द हौदज में सवार होकर सफर करती थीं। और चन्द मख्सूस आदमी उस होदंज को ऊँट पर लादने और उतारने के लिए मुकर्रर थे। हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा की रवांगी से कुछ पहले लश्कर से बाहर रफ़अ हाजत के लिए तशरीफ़ ले गईं। जब वापस हुईं तो देखा कि उनके गले का हार कहीं टूट कर गिर पड़ा है। वो दोबारा उस हार की तलाश में लश्कर से बाहर चली गईइस मरतबा वापसी में कुछ देर लग गई। और लश्कर रवाना हो गया। आपका होदज लादने वालों ने ये ख़याल करके कि उम्मुल मोमिनीन होदज के अन्दर तशरीफ फरमा हैं होदज को ऊँट पर लाद दिया। और पूरा काफला मंजिल से रवाना हो गयाजब हज़रते आइशा रदियल्लाहु अन्हा मंज़िल पर वापस आईं। तो यहाँ कोई आदमी मौजूद नहीं था। तन्हाई से सख्त घबराईं। अन्धेरी रात में अकेले चलना भी खतरनाक था। इस लिए वो ये सोचकर वहीं लेट गईं कि जब अगली मंजिल पर लोग मुझे न पाँएगे तो ज़रूर ही मेरी तलाश में यहाँ आएँगे। वो लेटी लेटी सो गईं। एक सहाबी जिनका नाम हजरते सफ़वान बिन मुअत्तल सुलमी रदियल्लाहु अन्हु था। वो हमेशा लश्कर के पीछे पीछे इस ख़याल से चला करते थे ताकि लश्कर का गिरा पड़ा सामान उठाते चलें वो जब उस मंज़िल पर पहुंचे तो हजरते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा को देखा और चूंकि पर्दा की आयत नाज़िल होने से पहले वो बारहा उम्मुल मोमिनीन 'को देख चुके थे। इस लिए देखते ही पहचान लिया। और उन्हें मुर्दा समझकर 'इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन पढ़ा । इस आवाज़ से वो जाग उठीं। हजरते सफ़वान बिन मुअत्तल सुलमी रदियल्लाहु अन्हु ने फौरन ही अपने ऊँट पर सवार कर लिया। और खुद ऊँट की मुहार थामकर पैदल चलते हुए अगली मंजिल पर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पास पहुंच गए।
मुनाफ़िकों के सरदार अब्दुल्लाह बिन उबई ने इस वाकिओ कों हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा पर तोहमत लगाने का जरीआ बना लिया। और खूब खूब उस तोहमत का चर्चा किया। यहाँ तक कि मदीने में उस मुनाफ़िक ने इस शर्मनाकतोहमत को इस कदर उछाला और इतना शोर-ो गुल मचाया कि मदीने में हर तरफ इस इफ्तरा और तोहमत का चर्चा होने लगाऔर बङ्ज़ मुसलमान मसलन हज़रते हस्सान, बिन साबित और हज़रते मिसतह बिन उसासा और हज़रते हमना बिन्ते हजश रदियल्लाहु अन्हुम ने भी उस तोहमत को फैलाने में कुछ हिस्सा लिया। हुजूर अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को इस शर अंगेज़ तोहमत से बेहद रंज व सदमा पहुँचाऔर मुख्लिस मुसलमानों को भी इन्तिहाई रंज व ग़म हुआ। हज़रते बीबी आएशा रदियल्लाहु अन्हा मदीना पहुँचते ही सख्त बीमार हो गईं। पर्दा नशीन तो थी ही साहिबे फराश हो गईं। और उन्हें इस तोहमत तराशी की बिल्कुल ख़बर ही नहीं हुई। गो कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा की पाकदामनी का पूरा पूरा इल्म व यकीन थामगर चूंकी अपनी बीवी का मामला था। इस लिए आपने अपनी तरफ से अपनी बीवी की बराअत और पाकदामनी का एलान करना मुनासिब नहीं समझाऔर वहीए इलाही का इन्तिजार फरमाने लगेहाँ इस दर्मियान में आप अपने मुख्लिस अस्हाब से इस मामले में मश्वरा फ़रमाते रहे ताकि उन लोगों के खयालात का पता चल सके । (बुख़ारी जि.२ स.५९४)
चूनान्चे हजरते उमर रदियल्लाहु अन्हु से जब आप ने उस तोहमत के बारे में गुफ्तगू फ़रमाई। तो उन्होंने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ये मुनाफिक यकीनन झूट है। इस लिए कि जब अल्लाह तआला को ये गवारा नहीं है कि आपके जिस्मे अतहर पर एक मक्खी भी बैठ जाए। क्योंकि मक्खी नजासतों पर बैठती है। तो भला जो औरत ऐसी बुराई की मुरतकब हो खुदावंदे कुडूस कब? और कैसे बर्दाश्त फरमाएगा कि वो आपकी जौजियत में रह सके!
हजरते उस्मान गनी रदियल्लाहु अन्हु ने कहा कि या रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) जब अल्लाह तआला ने आपके साया को ज़मीन पर नहीं पड़ने दिया ताकि उस पर न पड़ सक तो भला उस मअबूदे बरहक की गैरत कब ये 'गवारा करेगी कि कोई इन्सान आपकी ज़ौजए.मुहतरमा के साथ ऐसी कबाहत का मुरतकब हो सके? हज़रते अली रदियल्लाहु अन्हु ने ये गुजारिश की कि या रसूलल्लाह! सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) एक मर्तबा आपकी नअलैने अकदस में नजासत लग गई थी। तो अल्लाह तआला ने हज़रते जिबरईल अलैहिस्सलाम को भेजकर आपको ख़बर दी कि आप अपनी नअलैने अक़दस को उतार दें इस लिए हज़रते बीबी आएशा मआज़ल्लाह अगर ऐसी होती तो जरूर अल्लाह तआला आप पर वही नाज़िल फरमा देता कि "आप उनको अपनी ज़ौजियत से निकाल दें।"
हज़रते अबू अय्यूब अन्सारी रदियल्लाहु अन्हु ने जब इस तोहमत की खबर सुनी तो उन्होंने अपनी बीवी से कहा कि ऐ बीवी! तू सच बता! अगर हज़रते सफ़वान बिन मुअत्तल की जगह मैं होता तो क्या तू ये गुमान कर सकती है कि. मैं हुजूर अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की हरम पाक के साथ ऐसा कर सकता था? तो उनकी बीवी ने जवाब दिया। कि अगर हज़रते आइशा । रदियल्लाहु अन्हा की जगह मैं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बीवी होती। तो खुदा की कसम! मैं कभी ऐसी खयानत नहीं कर सकती थी। तो फिर हज़रते आइशा रदियल्लाहु अन्हा जो मुझ से लाखों दर्जे बेहतर हैंऔर हजरते सफवान बिन मअत्तल रदियल्लाह अन्ह जो बदरजहा तुम से बेहतर हैं भला क्योंकर मुमकिन है कि ये दोनों ऐसी खयानत कर सकते हैं? (मदारिकुल तन्जील मिस्री जि.२ स. १३४ ता १३५)
बुख़ारी की रिवायत है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इस मामले में हज़रते अली और उसामा रदियल्लाहु अनहुमा से जब मशवरा तलब फरमाया तो हज़रते उसामा रदियल्लाहु अन्हु ने बरजस्ता कहाँ कि ''अह्लुका वला नअलमु इल्ला खैरा' कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम वो आपकी बीवी हैं और हम उन्हें अच्छी ही जानते हैं। और हज़रते अली रदियल्लाहु अन्हु ने ये जवाब दिया कि या रसूलल्लाह! अल्लाह तआला ने आप पर कोई तंगी नहीं डाली है। औरतें उनके सिवा बहुत हैं । और आप उनके बारे में उनकी लौंडी (हज़रते बरीरा) से पूछ लें। वो आपसे सच मुच कह देंगी!
हज़रते बरीरा रदियल्लाहु अन्हा से जब आपने सवाल फ़रमाया तो उन्होंने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) उस जाते पाक की कसम जिसने आपको रसूले बरहक बनाकर भेजा है कि मैं ने हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अनहा में कोई अब नहीं देखा हाँ इतनी बात ज़रूर है कि वो अभी कमसिन लड़की हैं वो गूंधा हुआआटा छोड़कर सो जाती हैं और बकरी आकर खा डालती है! फिर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपनी
फिर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपनी जौजए मुहतरमा हज़रते जैनब बिन्ते जहिश रदियल्लाहु अन्हा से दर्याफ्त फरमाया जो हुस्ने जमाल में हज़रते आइशा रदियल्लाहु अनहा की मिस्ल थीं। तो उन्होंने कसम खाकर ये अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! "अहमी समई व बसरि वल्लाहिं मा अलिम्तु इल्ला खैरा'' मैं अपने कान और आँख की हिफ़ाज़त करती हूँ। खुदा की कसम मैं तो हज़रते बीबी आइशा को अच्छी ही जानती हूँ।
(बुख़ारी बाब हदीसुल इफक जि.२ स.५९६)
इस के बाद हजर सल्लल्लाह तआला अलैहि वसल्लम ने एक दिन मिंबर पर खड़े होकर मुसलमानों से फ़रमाया कि उस शख्स की तरफ से मुझे कौन मअजूर समझेगा। या मेरी मदद करेगा जिसने मेरी बीवी पर बोहतान तराशी करके मेरी दिल आजारी की है।"
"वल्लाहि मा अलिम्तु अला अह्या इल्ला खैरा" खुदा की कसम! मैं अपनी बीवी को हर तरह की अच्छी ही जानता हूँ' __ "व ल-कद ज-क-रू रजूलम मा अलिम्तु अलैहि इल्ला खैरा" और उन लोगों (मुनाफ़िकों) ने (इस बोहतान में) एक ऐसे मर्द (सफवान बिन मुअत्तल) का जिक्र है। जिसको मैं बिल्कुल अच्छा ही जानता हूँ।
(बुख़ारी जि.२ स.५९५ हदीसुल इफक)
हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बरसरे मिंबर इस तकरीर से मालूम हुआ कि हुजूर अकदस सल्लल्लाहु तआला. अलैहि वसल्लम को हज़रते आइशा और हज़रते सफ़वान बिन मुअत्तल रदियल्लाहु अन्हुमा दोनों की बराअत व तहारत और इफ्फ़त व पाकदामनी का पूरा पूरा इल्म और यकीन था। और वही नाज़िल होने से पहले ही आपको यकीनी तौर पर मालूम था कि मुनाफ़िक झूटे और उम्मुल मुमिनीन पाकदामन हैंवर्ना आप बरसरे मिंबर कसम खाकर उन दोनों की अच्छाई का मजमओ आम में हरगिज़ एलान न फ़रमाते। मगर पहले ही एअलाने आम न फरमाने की वजह यही थी कि अपने बीवी की पामदामनी का अपनी ज़बान से एलान करना हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मुनासिब नहीं समझते थे। जब हद से ज्यादा मुनाफ़िकीन ने शोरे गोगा कर दिया तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मिंबर पर अपनेख़याले अकदस का इजहार फ़रमा दिया। मगर अब भी एअलाने आम के लिए आप को वहीए इलाही का इन्तिज़ार ही रहा
ये पहले तहरीर किया जा चुका है कि उम्मुल मोमिनीन हज़रते आइशा रदियल्लाहु अन्हा सफ़र से आते ही बीमार होकर साहिबे फराश हो गई थीं। इस लिए वो इस बोहतान के तूफान से बिल्कुल ही बे खबर थीं। जब उन्हें मर्ज से कुछ सेहत हासिल हुई। और वो एक रात हजरते उम्मे मिसतह सहाबिया रदियल्लाहु अन्हा के साथ रफअ हाजत के लिए सहरा में तशरीफ ले गईं। तो उनकी जबानी उन्होंने इस दिलखराश और रूहफ़रसा खबर को सुना जिंस से उन्हें बड़ा धचका लगा। और वो शिद्दते रंज व गम से निढाल हो गईं। चुनान्चे उनकी बीमारी में मजीद इजाफा हो गया।
और वो दिन रात बिलक बिलक कर रोती रहीं। आख़िर जब उनसे ये सदमए जानकाह बर्दाश्त न हो सका। तो वो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से इजाजत लेकर अपनी वालिदा के घर चली गईं और इस मनहूस ख़बर का तज्किरा अपनी वालिदा से किया। माँ ने काफी तसल्ली व तशफ्फी दी। मगर ये बराबर लगातार रोती ही रहीं। इसी हालत में नागहाँ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तशरीफ़ लाए। और फरमाया कि ऐ आइशा! तुम्हारे बारे में ऐसी ऐसी ख़बर उड़ाई गई है। अगर तुम पाकदामन हो और ये ख़बर झूटी है। तो अनकरीब खुदावंद तआला तुम्हारी बराअत का बजरिओ वही एअलान फरमा देगा। वर्ना तुम तौबा व इस्तिग़फ़ार कर लो। क्योंकि जब कोई बन्दा खुदा से तौबा करता है। और बख्शिश माँगता है तो अल्लाह तआला उसके गुनाहों को मुआफ फरमा देता है । हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ये गुफ्तुगू सुनकर हज़रते आइशा रदियल्लाहु अन्हा के आँसू बिल्कुल थम गए। और उन्होंने अपने वालिद हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु से कहा कि आप रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का जवाब दीजिए। तो उन्होंने फरमाया कि खुदा की कसम मैं नहीं जानता कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को क्या जवाब दूं? फिर उन्होंने माँ से जवाब देने की दरख्वास्त की। तो उनकी माँ ने भी यही कहा। फिर खुद हजरते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ये जवाब दिया कि लोगों ने जो एक बे बुनियाद उड़ाई है और ये लोगों के दिलों में बैठ चुकी है। और कुछ लोग इसको सच समझ चुके हैं। इस सूरत में अगर मैं ये कहूँ कि मैं पाक दामन हूँ तो लोग इसकी तसदीक करेंगे। और अगर मैं इस बुराई का इकरार कर लूँ तो सब मान लेंगे हालाँकि अल्लाह तआला जानता है कि मैं इस इलज़ाम से बरी और पाक दामन हूँ। इस वक्त मेरी मिसाल हज़रते यूसुफ अलैहिस्सलाम के बाप (हजरते यकूब अलैहिस्सलाम) जैसी है लिहाजा मैं भी वही कहती हूँ जो उन्होंने कहा था यानी"
__"फ-सबरुन जमील। वल्लाहुल मुस-तआनु अला मा तसिफून।'' ये कहती हुई उन्हेंने करवट बदल कर मुँह फेर लिया। और कहा कि अल्लाह तआला जानता है कि मैं इस तोहमत से बरी और पाकदामन हँ। और मझे यकीन है कि अल्लाह तआला ज़रूर मेरी बराअत ज़ाहिर फरमा देगा। हजरते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा का जवाब सुनकर अभी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अपनी जगह से उठे भी न थेऔर हर शख्स अपनी जगह पर बैठा ही हुआ था कि नागहाँ हुजूर सल्लल्लाह तआला अलैहि वसल्लम पर वही नाज़िल होने लगी। और आप पर वही के वक्त की बे चैनी शुरू हो गई। और बावुजूद ये कि शदीद सर्दी का वक्त था। मगर पसीने के कतरात मोतियों की तरह आप के बदन से टपकने लगे। जब वही उतर चुकी तो हंसते हुए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि ऐ आइशा! तुम खुदा का शुक्र अदा करते हुए उसकी हम्द करो। कि उसने तुम्हारे बराअत और पाकदामनी का एलान फ़रमा दिया। और फिर आपने कुरआन की सूरए नूर में से दस आयतों की तिलावत फ़रमाई। जो''
"इन्नल्लजीना जाऊका बिल इक्कि' से शुरू होकर "व अन्नल्लाहा रऊफुर रहीम।'' पर ख़त्म होती है!
___ इन आयात के नाज़िल हो जाने के बाद मुनाफ़िकों का मुँह काला हो गया। और हज़रते उम्मुल मोमिनीन बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा की पाकदामनी का आफ्ताब अपनी पूरी आबे ताब के साथ इस तरह चमक उठा कि कियामत तक आने वाले मुसलमानों के दिलों की दुनिया में नूरे ईमान से उजाला हो गयाहजरते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु को हज़रते मिसतह बिन उसासा पर बड़ा गुस्सा आया। ये आपके खलाजाद भाई थे और बचपन ही में उनके वालिद वफात पा गए थे तो हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु ने उनकी परवरिश भी की थी
और उनकी मुफ्लिसी की वजह से आप उनकी माली इमदाद फरमाते रहते थे। मगर इसके बा वुजूद हज़रते मिसतह बिन उसासा रदियल्लाहु अन्हु ने भी इस तोहमत तराशी और इस का चर्चा करने में कुछ हिस्सा लिया था इस वजह से हजरते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु ने गुस्से में भरकर ये कसम खा ली कि अब मैं मिसतह बिन उसासा की कभी भी कोई माली इमदाद नहीं करूँगा। इस मौको पर अल्लाह तआला ने ये आयत नाजिल फरमाई कि -
वला यअ-तलि ऊलुल फलि मिन्कुम वस-स-अति अय्युअतू ऊलिल कुर्बा वल-मसाकीना वल-मुहाजिरीना फी सबीलिल्लाहि, वल-यअफू वल-यस- फहूअला तुहिब्बूना अंय्यगफिरल्लाह लकम! पला"
तर्जमा :- और कसम न खाएँ वो जो तुम में फजीलत वाले और गुन्जाइश वाले हैं। कराबत वालों, और मिस्कीनों और अल्लाह की राह में हिजरत करने वालों को देने कीऔर चाहिए कि मुआफ करें और दर गुज़र करें। क्या तुम इसे पसन्द नहीं करते कि अल्लाह तुम्हारी बख्शिश करे, और अल्लाह बहुत बख्शने वाला और बड़ा मेहरबान है।
इस आयत को सुनकर हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु ने अपनी कसम तोड़ डाली। और फिर हजरते मिसतह बिन उसासा रदियल्लाहु अन्हु का खर्च बदस्तूर साबिक अता फरमाने लगे। (बुख़ारी हदीसुल इफक जि.२ स. ५९५ ता ५९६)
फिर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मस्जिदे नबवी में एक खुत्बा पढ़ा। और सूरए नूर की आयतें तिलावत फरमाकर मजमले आम में सुना दी। और तोहमत लगाने वालों में हज़रते हस्सान बिन साबित व हज़रते मिसतह बिन उसासा व हजरते हमना बिन्ते जहिश रदियल्लाहु अन्हु और रईसुल मुनाफिकीन अब्दुल्लाह बिन उबई इन चारों को हद्दे किजफ की सजा में अस्सी अस्सी दुर्रे मारे गए।
(मदारिज जि.२ स. १६३ वगैरा)
__शारेह बुख़ारी अल्लामा किरमानी अलैहिर्रहमा ने फ़रमाया कि हज़रते बीबी आएशा की बराअत और पाकदामनी कतई व यकीनी है जो कुरआन से साबित है। अगर कोई इसमें ज़रा भी शक करे तो वो काफ़िर है। (हाशिया बुख़ारी जि.२ स.५९५) दूसरे तमाम फुकहाए उम्मत का भी यही मसलक है