अनुवाद सूरतुज्जुमरि

अनुवाद हम्मद सरवर फारूकी नदवी


अल्लाह का नमा लेकर शुरू करता हूँ जो बडा मेहरबान, निहायत रहम करने वाला (असीम कृपालु, महादयालु) है।


१ इस किताब का उतारा जाना अल्लाह की ओर से है जो गालिब (प्रभुत्वशाली) हिकमत वाला है


२- यह किताब 'हमने' आप की ओर सच्चाई के साथ उतारी है, अतः आप अल्लाह ही की इबादत कीजिए, दीन को 'उसके लिए ख़ालिस करते हुए 


३- सुन लो! कि इबादत सारी अल्लाह ही के लिए है, और जिन लोगों ने अल्लाह के सिवा दूसरे हिमायती बना रखेहैं (और कहते हैं), "हम इनकी इबादत (पूजा) केवल इसलिए करते हैं कि हमें अल्लाह से निकट कर दे


हैं (और कहते हैं), "हम इनकी इबादत (पूजा) केवल इसलिए करते हैं कि हमें अल्लाह से निकट कर दे।" अल्लाह उनमें फैसला कर देगा जिस में ये मतभेद कर रहे हैं, बेशक अल्लाह उस व्यक्ति को राह नहीं दिखाता जो झूठा और नाशुक्रा हो


५- 'उसी ने' आसमानों और ज़मीन को हक के साथ पैदा किया, 'वह' रात को दिन पर लपेटता है और दिन को रात पर लपेटता है, और 'उसी' ने सूरज और चाँद को काम में लगा रखा है, हर एक निर्धारित समय तक चलते रहेंगे; जान लो! 'वही' बड़ी ताकत वाला (प्रभुत्वशाली), बख्शने वाला है।"


६- 'उसीने' तुमको एक जान (व्यक्ति) से पैदा किया, फिर उससे उसका जोड़ा बनाया और 'उसीने' तुम्हारे लिए मवेशियों की आठ किस्में (नर और मादा) पैदा की; 'वह' तुम्हें तुम्हारी माँओं के पेट में तीन अन्धकारों के बीच पैदा करता (और बनाता) चला जाता है- एक बनावट के बाद दूसरी बनावट में- 'वही' अल्लाह तुम्हारा 'रब' है, 'उसी का राज्य है, 'उसके सिवा कोई मअबूद (उपास्य) नहीं, फिर तुम कहाँ फिरे जाते हो?


७- अगर तुम इन्कार करोगे तो अल्लाह तुमसे बेपरवाह (निस्पृह) है, और 'वह' अपने बन्दों के लिए इन्कार को पसंद नहीं करता, और अगर तुम शुक्र करोगे, तो 'वह' इसे तुम्हारे लिए पसंद करेगा; और बोझ उठाने वाला किसी दूसरे का बोझ नहीं उठाएगा, फिर तुम्हारी वापसी तुम्हारे रब ही की ओर होनी है, वह तुम को बताएगा कि तुम क्या करते थे वह तो दिलों के हाल तक को जानता है?


८- और इन्सान को जब कोई तकलीफ पहुँचती है तो ४- अगर अल्लाह किसी को अपना बेटा बनाना चाहता, तो 'वह' अपनी मख्लूक (सृष्टि) में से जिसको चाहता चुन लेता, (लेकिन) 'वह' तो नक्स व ऐब से पाक (महान और उच्च) है, वह अल्लाह एक है सब पर मज़बूत पकड़ रखने वाला;


९- (क्या ऊपर वाला व्यक्ति अच्छा है) या वह जो रात की घड़ियों में सज्दः और कियाम की हालत में (इबादत में लगा) रहता है, और आख़िरत से डरता और अपने रब की रहमत का उम्मीदवार है? कह दीजिए, 'क्या जो लोग जानते हैं? और जो नहीं जानते दोनों बराबर हो: सकते हैं? नसीहत (शिक्षा) तो समझ वाले ही हासिल करते हैं।'' १०- कह दीजिए 'ऐ 'मेरे' बन्दो! जो ईमान लाए हो (अपने रब से डरो, जो लोग इस दुनिया में नेक बन कर रहे उनके लिए भलाई है, और अल्लाह की जमीन फैली हई है. सब्र करने वालों को तो उनका बदला बेहिसाब दिया जाएगा।''


११- कह दीजिए, "मुझे हुक्म दिया गया है कि मैं अल्लाह ही की इबादत करूं, दीन को 'उसके लिए खालिस कर के;


१२. और मुझे यह भी हुक्म दिया गया है कि मैं सबसे . पहले मुस्लिम (आज्ञाकारी) बनूं।"


१३ कह दीजिए, "अगर मैं अपने रब की नाफरमानी (अवज्ञा) करूँ तो मुझे एक सख़्त दिन के अज़ाब का डर है।"


१४- कह दीजिए, ''मैं तो अल्लाह ही की इबादत करता हूँ, दीन (श्रद्धा और दासता) को उसके लिए खालिस कर के।


१५- तो तुम 'उसके सिवा जिसकी चाहो इबादत करो, कह दीजिए, "वास्तव, में घाटे में पड़ने वाले तो वही लोग हैं जिन्होंने अपने आपको और अपने परिवार वालों को कियामत के दिन घाटे में डाल दिया। जान लो! यही खला घाटा है:


१६- उनके लिए उनके ऊपर से भी आग की छतरियां होंगी और उनके नीचे से भी छतरियां होंगी, यह वह चीज़ है जिससे अल्लाह अपने बन्दों को डराता है, ऐ 'मेरे' बन्दो! मेरा तकवा (डर) रखो।"


१७- और जिन लोगों ने तागूत (शैतान) की इबादत से अपने आप को बचाया और अल्लाह की ओर रुजूअ (आकर्षित) हुआ उनके लिए खुशखबरी है, तो 'मेरे' बन्दों को खुशखबरी दे दीजिए;


१८ जो बात को ध्यान से सुनते हैं, फिर अच्छी-अच्छी बातों पर चलते हैं,- यही वे लोग हैं- जिनको अल्लाह ने हिदायत दी है, और यही बुद्धिमान हैं।


१९- भला जिस व्यक्ति पर अज़ाब का हुक्म हो चुका


२०- लेकिन जो लोग अपने रब से डरते हैं, उनके लिए (महल) मंज़िल पर मंज़िल बनी हुई हैं, उनके नीचे नहरें बह रही हैं, यह अल्लाह का वादा है, अल्लाह अपने वादे के खिलाफ नहीं करता है।


२१- क्या तुम नहीं देखते, अल्लाह आसमान से पानी उतारता है ,फिर उसको ज़मीन के अन्दर स्रोतों के रूप में, जारी कर देता है, फिर उससे खेतियां पैदा करता है जिसके तरह-तरह के रंगे होते हैं- फिर वह सूख जाती है, और तुम देखते हो कि पीली पड़ गई है। फिर वह उनको चूर्ण विचूर्ण (चूर-चूर) कर देता है? बेशक, इसमें नसीहत है बुद्धि रखने वालों के लिए।


२२- क्या वह व्यक्ति जिसका सीना अल्लाह ने इस्लाम के लिए खोल दिया हो, फिर वह अपने रब की ओर से रोशनी पर हो? तो तबाही है उनके लिए जिनके दिल अल्लाह के जिक्र (याद) से सख्त हो रहे हैं, यही लोग खुली गुमराही में हैं।


२३- अल्लाह ने बेहतरीन कलाम (ईशवाणी) नाज़िल किया, एक ऐसी किताब जिसकी आयतें एक-दूसरे से मिलती-जुलती हैं, और (इस लायक हैं कि) बार-बार दोहराई जाएँ, इससे उन लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं, जो लोग अपने रब से डरते हैं, फिर उनके शरीर और उनके दिल नर्म (होकर) अल्लाह के याद की ओर झुक जाते हैं, यही अल्लाह की हिदायत (मार्गदर्शन) है, 'वह' इससे जिसको चाहता है राह दिखाता है, और जिसे अल्लाह गुमराह करे (अर्थात पथभ्रष्ट रहने दे) उसको कोई हिदायत देने वाला नहीं


२४- क्या वह व्यक्ति जो कियामत के दिन बुरे अज़ाब से बचने के लिए अपने चेहरे को ढाल बनाएगा (और वह जो अज़ाब से बचा हुआ होगा दोनों बराबर हो सकते हैं) और ज़ालिमों से कहा जाएगा, "चखो! मज़ा उस कमाई का, जो तुम करते रहे हो।"


२५- जो लोग इनसे पहले थे उन्होंने भी झुठलाया था, तो उन पर वहां से अज़ाब आ पहुंचा, जहां से उनको गुमान भी न था।


२६- फिर अल्लाह ने उन्हें दुनिया की ज़िन्दगी में भी रूसवाई का मज़ा चखाया और आखिरत का अज़ाब तो इससे भी बड़ा है, काश! ये जानते


२७- और 'हमने' इस कुआन में लोगों के लिए हर तरह की मिसालें बयान कर दी हैं, ताकि वे नसीहत हासिल करें;


२९- अल्लाह एक मिसाल पेश करता है कि 'एक व्यक्ति है, जिसमें कई शरीक हैं आपस में खींचातानी करने वाले हैं; और एक व्यक्ति वह है, जो पूरा का पूरा एक ही व्यक्ति का है, क्या, दोनों का हाल एक जैसा होगा? सारी तअरीफ़ (प्रशंसा) अल्लाह ही के लिए है, मगर अक्सर लोग नहीं जानते।


३०-(ऐ नबी) तुम्हें भी मरना है और इन्हें भी मरना है,


३१- फिर तुम सब कियामत के दिन अपने रब के सामने झगड़ोगे


३२- फिर उससे बढ़कर ज़ालिम कौन होगा, जिसने अल्लाह पर झूठ बाँधा और सच्चाई जब उसके पास आई तो उसे झुठला दिया, क्या ऐसे काफिरों का ठिकाना जहन्नम में नहीं है!?


३३- और जो व्यक्ति सच्चाई लेकर आया और जिसने उसको सच माना, ऐसे ही लोग मुत्तकी (परहेज़गार) हैं;


३४- उनके लिए उनके रब के पास वह सब कुछ होगा, जो वे चाहेंगे, भलाई करने वालों का यही बदला है;


३५- ताकि अल्लाह उनके बुरे काम जो उन्होंने किये उनसे दूर कर दे, और उन के भले कामों के बदले में जो उन्होंने किये, उनका बदला दे।


३६- क्या अल्लाह अपने बन्दों के लिए काफी नहीं! और यह लोग तुमको अल्लाह के सिवा दूसरे मअबूदों से डराते हैं? और अल्लाह जिसे गुमराही में डाल दे तो उसको कोई राह दिखाने वाला नहीं;


३७- और जिसे अल्लाह राह दिखाए उसे कोई गुमराह करने वाला नहीं, क्या अल्लाह गालिब (प्रभुत्वशाली) बदला लेने वाला नहीं है? २८- एक अरबी कुनि के रूप में, जिसमें कोई टेढ़ नहीं, ताकि वे परहेज़गारी अपनाएँ।


.३८- और अगर आप उनसे पूछे, "आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया?" तो वे ज़रूर कहेंगे, "अल्लाह ने।' कहिए "तुम्हारा क्या विचार है? अगर अल्लाह मुझे कोई तकलीफ पहुँचानी चाहे तो अल्लाह से हटकर जिनको तुम पुकारते हो, वे 'उसकी' पहुँचाई हुई तकलीफ को दूर कर सकते हैं? या 'वह' मुझ पर कोई मेहरबानी करना चाहे तो क्या ये 'उसकी' रहमत को रोक सकते हैं?" कहिए, 'मेरे लिए अल्लाह ही काफी है, भरोसा करने वाले 'उसी' पर भरोसा करते हैं।"


३९- कहिए, ''ऐ मेरी कौम! तुम अपनी जगह काम करो, मैं (अपनी जगह) काम करता रहूँगा, तो बहुत जल्द तुम्हें मालूम हो जाएगा;


४०- कि किस पर अज़ाब आता है जो उसे रूसवा कर देगा और किस पर हमेशा का अज़ाब नाज़िल होता है।


४ १ यैह  '' केताब हक के साथ लोगों के लिए तम पर उतार दी है, तो जो व्यक्ति हिदायत हासिल करेगा वह अपने ही लिए करेगा, और जो गुमराह होगा तो उसकी गुमराही का वबाल उसी पर पड़ेगा, आप उनके ज़िम्मेदार नहीं हैं। ___


४२- अल्लाह ही रूहों (प्राणों) को कब्ज़ करता है- लोगों की मौत के समय-और उन को भी जिनको मौत नहीं आई- नींद की हालत में- फिर जिनकी मौत का फैसला 'वह' कर चुका होता है उनको रोक लेता है, और दूसरी रूहों (प्राणों) को एक निर्धारित समय के लिए वापस भेज देता है, इसमें निशनियां हैं उन लोगों के लिए जो सोच-विचार करते


४३- क्या उन्होंने अल्लाह को छोड़ कर दूसरों को सिफारिशी बना रखा है? कह दीजिए, "चाहे वे किसी चीज़ का भी अख्तियार न रखते हों और न समझते ही हों?


" ४४- कह दीजिए, ''सिफारिश (शफाअत) तो सारी की सारी अल्लाह ही के अख्तियार में है, आसमानों और जमीन की बादशाही 'उसी' की है, फिर 'उसी' की ओर तुम लौटाए जाओगे।"


४५- और जब केवल एक अल्लाह का जिक्र किया जाता है तो जो आख़िरत पर ईमान नहीं रखते, उनके दिल कुढ़ने लगते हैं, और जब इसके सिवा दूसरों का ज़िक्र होता है तो वे खुश हो जाते हैं। __


४६- कह दीजिए, ''ऐ अल्लाह! आसमानों और ज़मीन के पैदा करने वाले, गैब (परोक्ष) और हाज़िर (प्रत्यक्ष) के जानने वाले, 'तू' ही अपने बन्दों के बीच उन बातों का फैसला करेगा, जिनके बारे में वे मतभेद कर रहे हैं।"


४७- और अगर ज़ालिमों के पास वह सब कुछ हो, जो ज़मीन में है और उसी के बराबर और भी हो, तो यह कियामत के दिन बुरे अज़ाब से बचने के लिए सब कुछ फिद्या (मुक्ति प्रतिदान) में देने के लिए तैयार हो जाएंगे, और अल्लाह कीओर से उनके साथ वह मामला होगा जिसका उनको गुमान भी न था


४८- और जो कुछ उन्होंने कमाया उस की बुराई उन पर ज़ाहिर हो जाएगी, और वह चीज़ उन्हें घेर लेगी जिसकी वे हंसी उड़ाया करते थे।


४९- जब इन्सान को कोई तकलीफ पहुँचती है तो वह 'हमें पकारने लगता है, फिर जब 'हम' उसे अपनी ओर से कोई नेअमत देते हैं तो कहता है, ''यह तो मुझे अपने इल्म की वजह से मिली है।" (नहीं) बल्कि वह एक आज़माइश है, मगर उनमें अक्सर लोग नहीं जानते


५०- यही बात वे लोग भी कह चुके हैं, जो इनसे पहले थे, मगर जो कुछ वे किया करते थे, वह उनके कुछ काम न आया।


५१- फिर जो कुछ उन्होंने कमाया उसकी बुराइयां उन पर आ पड़ी, और उनमें से जिन लोगों ने जुल्म किया उन पर भी जो कुछ उन्होंने कमाया उसकी बुराइयां जल्द ही आ पड़ेंगी, और वे काबू से बाहर निकलने वाले नहीं


५२- क्या उनको मालूम नहीं कि अल्लाह जिसके लिए चाहता है रोज़ी कुशादा (ज़्यादती) कर देता है और (जिसके लिए चाहता है) नपी-तुली कर देता है? उनके लिए बड़ी निशानियां हैं जो ईमान लाते हैं।


५३- (ऐ नबी) कह दीजिए, 'ऐ मेरे बन्दो! जिन्होंने अपने आप पर ज़्यादती की, अल्लाह की रहमत से मायूस (निराश) न हों, अल्लाह सभी गुनाहों को माफ़ कर देता है, 'वह' बड़ा बखशने वाला, मेहरबान है।"


५४- और रूजूअ हो अपने रब की ओर, और 'उसी' के फरमाँबरदार (आज्ञाकारी) बन जाओ, इससे पहले कि तुम पर अज़ाब आ जाए, फिर तुम्हारी मदद न की जाएगी


५५- और तुम्हारे रब की ओर से जो बेहतरीन चीज़ (किताब) तुम्हारी ओर नाज़िल हुई है, उसकी पैरवी करो, इससे पहले कि तुम पर अचानक अज़ाब आ जाए और तुमको ख़बर भी न हो


५६- कहीं ऐसा न हो कि कोई नफ़्स (व्यक्ति) कहने लगे, "अफसोस मेरी उस कोताही पर! जो मैंने अल्लाह के मामले में की, और मैं तो मज़ाक उड़ाने वालों में से ही रहा; ५७- या कहने लगे अगर अल्लाह ने मुझे हिदायत दीहोती तो मैं भी परहेज़गारों में से होता।"


५८- या यह जब अज़ाब देखे तो कहने लगे, "काश! मुझे एक बार फिर (दुनिया में) लौट कर जाना हो, तो मैं भले लोगों में से बन जाऊँ।"


५९- "क्यों नहीं, मेरी आयतें 'तेरे' पास पहुँच गयी थीं, लेकिन तूने उनको झुठलाया और घमंड किया और इन्कार करने वालों में से हो गया;


६०- और कियामत के दिन तुम उनको देखोगे जिन्होंने अल्लाह पर झूठ गढ़ कर थोपा, कि उनके चेहरे स्याह होंगे, क्या घमंड करने वालों का ठिकाना जहन्नम में नहीं है?" ६१- और अल्लाह उन लोगों को नजात (मुक्ति) देगा, जो मत्तकी (परहेजगार) बने रहे. उनके कामियाबी की वजह से न कोई उनको तकलीफ पहुँचेगी, और न वे गमगीन (शोकाकुल) होंगे।


६२- अल्लाह ही हर चीज़ का पैदा करने वाला है और 'वही' हर चीज़ का निगेहबान (संरक्षक) है;


६ 3- 'उसी' के पास आसमानों और जमीन की कंजियां हैं; और जिन्होंने अल्लाह की आयतों का इन्कार किया, वही घाटे में रहने वाले हैं


६४- कह दीजिए, "क्या तुम मुझे अल्लाह के सिवा किसी और की इबादत करने का हुक्म देते हो, ऐ जाहिलो (ऐ अज्ञानियों)?"


६५- और आप की ओर जो आप से पहले गुज़र चुके हैं उनकी ओर भी वह्य की जा चुकी है, 'अगर तुमने शिर्क किया तो तुम्हारा किया धरा सब अकारथ हो जाएगा और तुम घाटे में पड़ने वालों में से हो जाओगे।''


६६- (नहीं,) बल्कि अल्लाह ही की इबादत करो और शुक्रगुजारों में से हो जाओ।


६७- और उन्होंने अल्लाह की जैसी कद्र करनी चाहिए थी वैसी नहीं की और कियामत के दिन सारी ज़मीन उसकी मुट्ठी में होगी, और आसमान लिपटे हुए 'उसके दाहिने हाथ में होंगे, और 'वह' पाक और बहुत बुलन्द है उससे, जो यह साझी ठहराते हैं।


६८- और जब सूर (नरसिंघा) फूंका जाएगा, तो जो लोग भी आसमानों और जमीन में हैं सब बेहोश हो कर गिर पड़ेंगे, सिवाय उसके जिसको अल्लाह चाहे; फिर दूसरी बारसूर फूंका जाएगा, तो यकायक लोग उठ खड़े हो कर देखने लगेंगे।


६९- और धरती अपने रब के नूर (प्रकाश) से जगमगा उठेगी, और किताब (कर्मपत्र) रख दी जाएगी, और नबियों, और गवाहों को लाया जाएगा, और उनमें हक के साथ फैसला कर दिया जाएगा, और उन पर कोई जुल्म न होगा;


७०- और हर व्यक्ति को उसके किये हुए काम का पूरापूरा बदला दिया जाएगा, और 'वह' खूब जानता है, जो कुछ ये करते रहे हैं


७१- और जिन लोगों ने इन्कार किया वे गिरोह के , गिरोह जहन्नम की ओर ले जाए जाएँगे, यहां तक कि जब वे वहाँ पहुँचेंगे तो उसके दरवाजे खोल दिये जाएँगे और उसके निगराँ (प्रहरी) उनसे कहेंगे, "क्या तुम्हारे पास तुम्हीं में से रसूल नहीं आए थे जो तुम्हें तुम्हारे रब की आयतें सुनाते और तुम्हें तुम्हारे इस दिन की मुलाकात से सचेत करते रहे हों?" कहेंगे, "क्यों नहीं (वे तो आए थे), किन्तु इन्कार करने वालों पर अज़ाब का हुक्म पूरा हो कर रहा।"


७२- कहा जाएगा,"जहन्नम के दरवाज़ों में दाखिल (प्रवेश) हो, उसमें हमेशा रहोगे, तो क्या ही बुरा ठिकाना है घमंड करने वालों का!"


७३- और जो लोग अपने रब से डरते हैं वे गिरोह के गिरोह जन्नत की ओर ले जाए जाएँगे, यहां तक कि जब वे वहाँ पहुँचेंगे (इस हाल में) कि उसके दरवाजे खुले होंगे, और उसके निगराँ (प्रहरी) उनसे कहेंगे, "सलाम हो तुम पर! बहुत अच्छे रहे, अब इसमें दाखिल हो हमेशा रहने के लिए।"


७४- और वे कहेंगे, "तमाम तअरीफ अल्लाह के लिए हैं'जिसने' हमारे साथ अपना वादा सच कर दिखाया, और हमें उस ज़मीन (जन्नत) का वारिस बनाया कि हम जन्नत में जहाँ चाहें वहाँ रहें बसें।" तो क्या ही अच्छा बदला (इनआम) है अमल करने वालों का


७५- और तुम देखोगे कि फ़रिश्ते अर्श (सिहांसन) के चारों ओर घेरा बनाए हुए, अपने रब की तस्बीह (गुणगान) कर रहे हैं, और उनमें हक के साथ फैसला कर दिया जाएगा कि (और) कहा जाएगा, "हर तरह की तअरीफ (स्तुतिसारे संसार के रब, अल्लाह, ही के लिए है।''